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IIT Bombay में साहिल वाकोडे की मौत: आरोपों की निष्पक्ष जाँच कैसे?

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संपादकीय विश्लेषण | 22 सितंबर 2026

सार: IIT Bombay के छात्र साहिल वाकोडे की मृत्यु के बाद परिवार ने जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए हैं। पुलिस जाँच जारी है; संस्थान और शिक्षकों का पक्ष अलग है। इस मामले से प्रवेश के बाद अकादमिक सहायता, छात्र सुरक्षा और शिक्षकों के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया पर कठिन सवाल उठे हैं।

अब तक क्या स्थापित है?

IIT Bombay के ऊर्जा विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग में दूसरे वर्ष के बीटेक छात्र साहिल वाकोडे की 18 सितंबर 2026 को मृत्यु हुई। परिवार की शिकायत पर पवई पुलिस ने प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला से जुड़े आरोपों पर प्राथमिकी दर्ज की। समाचार रिपोर्टों के अनुसार इसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधान शामिल हैं। FIR आरोपों की जाँच की शुरुआत है, अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में परिवार तथा संस्थान, दोनों के बयान हैं।

साहिल की उम्र पर प्रकाशित रिपोर्टों में 20 और 22 वर्ष, दोनों आंकड़े मिलते हैं। जन्मतिथि का प्रामाणिक सार्वजनिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं मिला, इसलिए यहाँ उम्र नहीं लिखी गई है। इसी तरह उनके व्यक्तिगत प्रवेश-कोटे, परीक्षा के अंक या अकादमिक प्रदर्शन का स्वतंत्र सत्यापन नहीं होता। उनकी पहचान को किसी अनुमानित शैक्षणिक कमजोरी से जोड़ना अनुचित होगा।

परीक्षा के दौरान क्या हुआ?

IIT Bombay ने शुरू में कहा था कि परीक्षा के दौरान साहिल के पास फोन मिला और उन्होंने प्रश्न को ChatGPT पर डाला था। संस्थान ने यह भी कहा कि उस समय तक औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी और विभागाध्यक्ष ने उन्हें आश्वस्त किया था कि यह घटना उनके अकादमिक भविष्य पर असर नहीं डालेगी। बाद में IIT ने मृत्यु से पहले की घटनाओं को समय से पहले निश्चित ढंग से पेश करने पर खेद जताया और कहा कि परिस्थितियाँ जाँच के अधीन हैं। इसलिए “ChatGPT का इस्तेमाल सिद्ध हो गया” लिखना अभी उचित नहीं। IIT के बाद के स्पष्टीकरण पर रिपोर्ट।

पुलिस को मिले CCTV के बारे में प्रकाशित विवरण संकेत देते हैं कि प्रोफेसर ने साहिल से परीक्षा के दौरान बात की और उन्हें बाहर जाने के लिए कहा। फुटेज में बातचीत की आवाज नहीं है; उससे कथित जातिगत शब्दों, धमकी या पूरे संदर्भ की पुष्टि नहीं होती। 22 सितंबर तक पुलिस सूत्रों पर आधारित रिपोर्ट में कोई सुसाइड नोट मिलने की सूचना नहीं थी। जाँच में बाद में नए दस्तावेज या बयान आ सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस: जाँच की स्थिति।

मृत्यु का कारण किसी एक घटना को ठहराना, चाहे वह कथित भेदभाव हो या परीक्षा का तनाव, उपलब्ध साक्ष्यों से आगे जाना होगा। मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संबंध, संस्थागत वातावरण और तत्काल परिस्थितियाँ अलग-अलग व्यक्तियों में अलग तरह से जुड़ सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की जिम्मेदार रिपोर्टिंग मार्गदर्शिका भी सरलीकृत कारण-निर्धारण और सनसनी से बचने को कहती है।

परिवार, संस्थान और छात्रों के अलग-अलग पक्ष

साहिल के पिता रविंद्र वाकोडे ने आरोप लगाया कि प्रोफेसर डूला ने लगभग तीन महीने से जाति संबंधी टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने निदेशक के व्यवहार पर भी आरोप लगाए और परीक्षा के बाद संभावित निलंबन की धमकी मिलने की बात कही। ये गंभीर आरोप हैं, लेकिन अभी जाँच से प्रमाणित तथ्य नहीं। परिवार को अपना पक्ष रखने, साक्ष्य देने और सुरक्षित, निष्पक्ष जाँच पाने का अधिकार है। परिवार के आरोप और IIT का जवाब।

IIT Bombay के निदेशक ने जातिगत भेदभाव के आरोपों से इनकार किया। संस्थान के SC/ST Students Cell ने कहा कि उसे साहिल की ओर से पहले कोई शिकायत नहीं मिली थी। “शिकायत दर्ज नहीं हुई” एक सीमित प्रशासनिक तथ्य है; इससे अपने-आप “भेदभाव नहीं हुआ” सिद्ध नहीं होता। छात्र शिकायत से डर सकते हैं या उन्हें प्रक्रिया का भरोसा न हो सकता है। दूसरी ओर, शिकायत का अभाव और अन्य रिकॉर्ड भी जाँच के लिए प्रासंगिक हैं। स्वतंत्र जाँच को इन संभावनाओं को साक्ष्य से परखना होगा।

छात्रों के एक समूह ने स्वतंत्र जाँच, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और अनुशासनात्मक बैठकों के लिखित रिकॉर्ड सहित कई माँगें रखीं। बाद में छात्र प्रतिनिधियों के बयानों में मतभेद भी सामने आए: कुछ ने स्पष्ट किया कि वे नकल का समर्थन नहीं करते और प्रोफेसर को पहले से दोषी नहीं मानते। छात्रों के अलग विचार को एक ही निष्कर्ष में समेटना गलत होगा।

प्रोफेसर डूला को Dean (Administrative Affairs) के पद से हटाया गया है; उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्हें प्रोफेसर के पद से निलंबित नहीं किया गया। IIT Bombay, Delhi और Madras के कुछ शिक्षकों ने उनके समर्थन में कहा कि परीक्षा की निगरानी में Senate-स्वीकृत नियम लागू करना शिक्षक का दायित्व है। उन्होंने मीडिया-ट्रायल तथा अनुशासन बनाए रखने पर संभावित असर को लेकर चिंता जताई। यह शिक्षकों का पक्ष है; इससे इस विशेष मामले में हर प्रक्रिया का पालन सिद्ध नहीं होता। IIT Madras के शिक्षकों ने छात्र सहायता की जाँच का सवाल भी उठाया। तीन IIT के शिक्षकों की प्रतिक्रिया।

अकादमिक अनुशासन में IIT के नियम क्या कहते हैं?

IIT Bombay की जुलाई 2026 की Senate-स्वीकृत अकादमिक कदाचार तालिका परीक्षा में अनधिकृत मोबाइल रखने को गंभीर उल्लंघन मानती है। उसमें FR ग्रेड और एक सेमेस्टर के अकादमिक निलंबन जैसी संभावित सजा लिखी है। लेकिन नियम में संभावित दंड लिखा होना और किसी छात्र पर वही दंड वास्तव में लगना अलग बातें हैं। इस मामले में संस्थान का प्रारंभिक कथन था कि औपचारिक कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी।

IIT Bombay की प्रकाशित विस्तृत प्रक्रिया में परीक्षा निरीक्षक द्वारा सामग्री सुरक्षित करने, मामला दर्ज करने, छात्र को उत्तर जारी रखने देने, समिति के सामने रिकॉर्ड रखने, जवाब का अवसर और अपील का प्रावधान मिलता है। वह विस्तृत दस्तावेज पुराना है; जुलाई 2026 की दंड-तालिका नई है। घटना के दिन कौन-सा अद्यतन प्रक्रिया-पत्र लागू था और उसका पालन कैसे हुआ, इसकी जाँच जरूरी है। केवल CCTV विवरण के आधार पर प्रक्रिया-उल्लंघन घोषित नहीं किया जा सकता। नियम लागू करना अपने-आप जातिगत अपमान के आरोप को असंभव भी नहीं बनाता।

SC/ST Act की कानूनी कसौटी

SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य जाति आधारित हिंसा और अपमान के खिलाफ प्रभावी कानूनी संरक्षण देना है। अधिनियम की धारा 3(1)(r) सार्वजनिक दृष्टि में किसी SC/ST व्यक्ति का जानबूझकर अपमान या डराने-धमकाने और उसे अपमानित करने की मंशा से संबंधित है। धारा 3(1)(s) सार्वजनिक दृष्टि में जाति के नाम से गाली देने से संबंधित है। शब्द, मंशा, संदर्भ और सार्वजनिक दृष्टि जैसे तत्व तथ्यों के आधार पर परखे जाते हैं। किसी SC/ST छात्र को खराब अंक देना या नियमानुसार फोन-उल्लंघन की रिपोर्ट लिखना अपने-आप इन धाराओं का अपराध नहीं है।

मीडिया रिपोर्टों में इस FIR के साथ 3(1)(r) और 3(1)(s) का उल्लेख है, लेकिन इस लेख के लिए मूल प्राथमिकी की प्रमाणित प्रति उपलब्ध नहीं हो सकी। इसलिए सटीक धाराओं की पूरी सूची पुलिस रिकॉर्ड से मिलानी होगी। BNS धारा 108 का आरोप भी मृत्यु, संबंधित आचरण और कानूनी दुष्प्रेरण के तत्वों की जाँच माँगता है; केवल घटनाओं की समय-निकटता अंतिम निष्कर्ष नहीं देती। धाराओं का मीडिया उल्लेख; BNS का आधिकारिक पाठ।

सुप्रीम कोर्ट ने हिटेश वर्मा निर्णय में कहा था कि SC/ST पहचान वाले व्यक्ति से हर विवाद अपने-आप इस अधिनियम का अपराध नहीं; आवश्यक कानूनी तत्व होने चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि जातिगत भेदभाव के आरोप सामान्यतः झूठे हैं। पृथ्वी राज चौहान निर्णय ने प्रथमदृष्टया अपराध और अग्रिम जमानत के प्रश्न को समझाया। अधिनियम की धारा 18A के तहत FIR से पहले अनिवार्य प्रारंभिक जाँच की शर्त नहीं लगाई जा सकती। इसलिए संस्थान की आंतरिक तथ्य-समीक्षा वैध शिकायत दर्ज कराने में बाधा नहीं बननी चाहिए।

यदि वैध अकादमिक निर्णयों को बिना तथ्य जाँचे सार्वजनिक रूप से अपराध घोषित किया जाए, तो शिक्षक अनुशासन लागू करने से हिचक सकते हैं। लेकिन यदि हर जातिगत शिकायत को “अंकों से असंतोष” कहकर खारिज कर दिया जाए, तो भेदभाव अकादमिक विवेक के पीछे छिप सकता है। शिक्षकों के बयानों से चिंता का अस्तित्व दिखता है; इस एक मामले से देशभर में ग्रेड बढ़ने या अनुशासन घटने का प्रभाव साबित नहीं होता।

आरक्षण प्रवेश का रास्ता है; डिग्री का मानक अलग प्रश्न

आरक्षण संवैधानिक और कानूनी प्रवेश-व्यवस्था का हिस्सा है। IIT में प्रवेश पाने वाले छात्रों ने निर्धारित चयन और पात्रता प्रक्रिया पूरी की होती है। आरक्षित श्रेणी से होना “मेरिट नहीं है” का पर्याय नहीं। JEE की तैयारी के लिए कोचिंग, स्कूल की गुणवत्ता, भाषा, घर में पढ़ाई का वातावरण और आर्थिक सुरक्षा अलग-अलग छात्रों को अलग संसाधन दे सकते हैं। इसे समझना किसी समूह को स्वभावतः कमजोर मानना नहीं है।

IIT Bombay की सार्वजनिक स्नातक नियम-पुस्तिका और अकादमिक कार्यालय की जानकारी में पाठ्यक्रम, क्रेडिट, ग्रेड और परीक्षा के सामान्य नियम हैं। इन सार्वजनिक नियमों में जाति के आधार पर अलग परीक्षा-पत्र या डिग्री-ग्रेडिंग मानक नहीं मिला। तैयारी पाठ्यक्रम या सहायता कार्यक्रम और डिग्री का शैक्षणिक मानक अलग बातें हैं। इससे किसी विशेष छात्र की कठिनाई का कारण नहीं निकाला जा सकता।

एक ही कक्षा के दो विद्यार्थियों ने प्रवेश परीक्षा पास की हो, फिर भी एक के पास अंग्रेजी माध्यम, महँगी कोचिंग और विषयगत पूर्व-ज्ञान हो तथा दूसरे के पास कम साधन। शुरुआत की इस असमानता का असर संभव है, पर उसका आकार, श्रेणी-वार वितरण और IIT Bombay के मौजूदा बैचों में प्रभाव बताने के लिए तुलनीय प्रकाशित डेटा चाहिए। इस जाँच में ऐसा डेटा नहीं मिला जो साहिल की स्थिति या सभी SC/ST छात्रों के प्रदर्शन के बारे में निष्कर्ष दे। दाखिले की श्रेणी को किसी व्यक्ति की क्षमता या मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान नहीं बनाना चाहिए।

IIT Bombay में कौन-सी मदद पहले से है?

“संस्थान में कोई सहायता नहीं” कहना गलत होगा। SC/ST Students Cell शिकायत, कल्याण और विभागीय विशेष फैकल्टी सलाहकारों की व्यवस्था बताता है; उसकी वेबसाइट पर गुमनाम शिकायत का रास्ता भी है। SC/ST mentorship programme में प्रथम वर्ष के लिए Fresher Companions तथा दूसरे वर्ष से Department-level Companions का उल्लेख है। इसका दायरा पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप, प्लेसमेंट और परिसर जीवन तक है। सभी नए छात्रों के लिए अलग Student Mentor Programme और Institute Student Companion Programme भी हैं।

Student Wellness Centre परामर्श और संकट सहायता देता है। Academic Support Programme गंभीर अकादमिक अड़चन के बाद नियोजित पाठ्यक्रम-भार और सलाह का रास्ता बताता है। यह उपयोगी पुनर्वास हो सकता है, पर उसकी सक्रियता की शर्त बताती है कि यह विशेष योजना मुख्यतः समस्या दिखने के बाद काम करती है। सारी सहायता “बहुत देर से आती है” कहना भी गलत होगा, क्योंकि मेंटरशिप और परामर्श पहले से उपलब्ध हैं। मूल्यांकन के लिए जानना होगा कि शुरुआती सेमेस्टर में कितने छात्र मदद लेते हैं, प्रतीक्षा समय और छात्र-विश्वास क्या है तथा कौन सहायता तक नहीं पहुँच पाता।

छात्रवृत्ति, फीस में छूट और तैयारी पाठ्यक्रम जैसे उपाय भी हैं। योजना का अस्तित्व, जरूरतमंदों तक उसकी पहुँच और उससे बेहतर परिणाम तीन अलग माप हैं। सार्वजनिक सामग्री से इन कार्यक्रमों के वास्तविक उपयोग और श्रेणी-वार प्रभाव का भरोसेमंद तुलनात्मक आकलन नहीं बनता।

मदद संकट से पहले कैसे पहुँचे?

समाधान का अर्थ आसान परीक्षा या कम कठोर डिग्री नहीं होना चाहिए। प्रारंभिक, स्वैच्छिक और बिना कलंक वाली सहायता एक विकल्प है: प्रथम सेमेस्टर में विषय तथा भाषा का डायग्नोस्टिक आकलन; जरूरत पर छोटे समूहों में ट्यूशन; तकनीकी अंग्रेजी और अध्ययन-कौशल की मदद; नियमित फैकल्टी तथा सहपाठी मेंटर; और आवश्यकता पर पाठ्यक्रम-भार की नियमानुसार समीक्षा। ऐसे उपाय विभिन्न पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए खुले हों, ताकि मदद लेना “कम क्षमता” का सार्वजनिक लेबल न बने।

मानसिक स्वास्थ्य सहायता को केवल संकट के बाद की सेवा न समझा जाए। छात्र को पता हो कि शिक्षक, मेंटर और काउंसलर में किससे किस बात पर बात कर सकता है; शिकायत की गोपनीयता कैसे बचेगी; और अकादमिक अनुशासनात्मक प्रक्रिया में किसे साथ ला सकता है। शिक्षकों को भी जातिगत अपमान की शिकायत पहचानने, संवेदनशील संवाद और निष्पक्ष दस्तावेजीकरण का प्रशिक्षण चाहिए। नीतियों के परिणामों को मापा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय टास्क फोर्स क्या कहती है?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स ने अकादमिक दबाव, अलगाव, भेदभाव, आर्थिक तनाव, संबंधों और सहायता की संस्थागत क्षमता को साथ देखने पर जोर दिया है। उसकी जून 2026 की अंतरिम रिपोर्ट सामाजिक तथा भाषाई अलगाव और जाति सहित अनेक प्रकार के भेदभाव की चर्चा करती है। रिपोर्ट प्रारंभिक और असमान गुणवत्ता के संस्थागत आंकड़ों पर निर्भर है; इसे किसी एक IIT, व्यक्ति या मृत्यु का कारण-निर्णय नहीं माना जा सकता।

रिपोर्ट में 31 केंद्रीय तकनीकी संस्थानों के उत्तरों के विश्लेषण में सहायता की उपलब्धता में असमानता दिखी। औपचारिक सहपाठी प्रशिक्षण की सूचना 10 और फैकल्टी-मेंटर प्रशिक्षण की सूचना चार संस्थानों ने दी। ये प्रारंभिक स्व-रिपोर्टेड संख्याएँ हैं; उनसे IIT Bombay की वर्तमान सेवा-गुणवत्ता या साहिल के अनुभव का अनुमान नहीं निकलता। टास्क फोर्स ने अकादमिक तैयारी, सामाजिक एकीकरण, वित्तीय समझ, भावनात्मक सहारे और अंग्रेजी भाषा सहायता वाले ब्रिज कार्यक्रमों का सुझाव दिया है।

IIT छात्रों की मौत, पढ़ाई छोड़ने या अकादमिक समाप्ति पर कई संख्याएँ सार्वजनिक बहस में घूमती हैं। लेकिन अलग समयावधि, परिभाषा और छात्र-समूहों को तुलनीय हर के बिना जोड़ने से गलत निष्कर्ष निकलेंगे। इस विश्लेषण के लिए ऐसा अद्यतन, सत्यापित IIT Bombay श्रेणी-वार डेटासेट नहीं मिला जिससे मृत्यु या अकादमिक प्रदर्शन का कारण किसी जाति अथवा प्रवेश श्रेणी को ठहराया जा सके। नीति बहस के लिए गोपनीयता-सम्मत, समेकित आंकड़े चाहिए; व्यक्तिगत छात्र रिकॉर्ड नहीं।

छात्र और शिक्षक दोनों के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया

विश्वसनीय व्यवस्था में शिकायत मिलने पर छात्र की तत्काल सुरक्षा, काउंसलिंग और प्रतिशोध से संरक्षण सुनिश्चित हो। परीक्षा रिकॉर्ड, शिकायतें, ईमेल, CCTV और निर्णय-क्रम सुरक्षित किए जाएँ। संस्था से स्वतंत्र सदस्य वाला पैनल, SC/ST Cell की सार्थक भागीदारी और शिक्षक को आरोपों का पर्याप्त विवरण तथा जवाब का अवसर मिले। अकादमिक निर्णय का लिखित आधार और समान मामलों से उसका मेल परखा जाए। निष्कर्ष तथा अपील का रास्ता कारण सहित दर्ज हो।

इस आंतरिक समीक्षा को पुलिस की वैधानिक शक्ति के ऊपर या FIR से पहले की अनिवार्य बाधा नहीं बनाया जा सकता। संभावित संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को दी जा सकती है और कानूनी प्रक्रिया अपने नियमों से चलेगी। संस्थान का काम साक्ष्य सुरक्षित करना, छात्र तथा गवाहों की रक्षा करना और निष्पक्ष आंतरिक निर्णय देना है—आरोप दबाना या पूर्व-निर्णय से किसी को दोषी ठहराना नहीं।

जाँच के नतीजे के बिना “SC/ST Act का दुरुपयोग हुआ” कहना उतना ही असावधान होगा जितना “जातिगत अत्याचार सिद्ध हो गया” कहना। प्रवेश के अवसर को न्यायसंगत बनाना और प्रवेश के बाद कठिन पढ़ाई में हर छात्र को निष्पक्ष मौका देना एक ही शिक्षा नीति के दो हिस्से हैं। डिग्री मानक बनाए रखते हुए अलग-अलग प्रारंभिक संसाधनों वाले छात्रों को जल्दी, सम्मानजनक और असर मापकर सहायता देना संभव है। गंभीर जातिगत शिकायत की पूरी जाँच और वैध नियम लागू करने वाले शिक्षक को उचित प्रक्रिया, परस्पर विरोधी लक्ष्य नहीं हैं।

किन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं?

  1. कथित जातिगत टिप्पणियों के बारे में कौन-से प्रत्यक्ष बयान, संदेश या अन्य साक्ष्य हैं?
  2. परीक्षा के दिन साहिल और प्रोफेसर के बीच वास्तव में क्या बातचीत हुई?
  3. कोई लिखित, गुमनाम या अनौपचारिक पूर्व शिकायत थी?
  4. उस दिन अकादमिक कदाचार की कौन-सी अद्यतन प्रक्रिया लागू थी?
  5. उस प्रक्रिया के कौन-से चरण दर्ज हैं?
  6. SC/ST Cell तक साहिल पहुँचे थे या नहीं; यदि नहीं, तो क्या बाधाएँ थीं?
  7. विभिन्न छात्र समूहों के शैक्षणिक परिणामों के तुलनीय आंकड़े क्या हैं?
  8. मेंटोरशिप, परामर्श और अकादमिक सहायता का उपयोग तथा मापा गया असर कितना है?
  9. भेदभाव शिकायत में स्वतंत्र सुनवाई और शिक्षक के जवाब की व्यवस्था कैसी है?
  10. सहायता पहली कठिनाई पर मिलती है या बड़े अकादमिक नुकसान के बाद?

निष्कर्ष

साहिल वाकोडे की मृत्यु से जुड़े आरोपों पर अंतिम राय पुलिस और सक्षम कानूनी प्रक्रिया के साक्ष्य के बाद ही बन सकती है। अभी जिम्मेदार प्रश्न यह है: IIT Bombay और दूसरे उच्च शिक्षण संस्थान क्या ऐसा वातावरण बना रहे हैं जिसमें छात्र बिना कलंक के मदद तथा शिकायत कर सकें, और शिक्षक बिना भय या पक्षपात के नियम लागू कर सकें?

सहायता: यदि आप या आपके परिचित मानसिक संकट में हैं, भारत सरकार की 24×7 Tele-MANAS सेवा 14416 पर संपर्क कर सकते हैं। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय।

Rajnish Kumar
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Rajnish Kumar

Rajnish Kumar is the Founder and Editor-in-Chief of The Press of Asia, an independent digital news platform based in Jhusi, Prayagraj, Uttar Pradesh, India. With expertise in digital journalism, SEO, and online media management, Rajnish is dedicated to delivering accurate, fact-checked, and timely news coverage across India and Asia. He covers topics ranging from national politics and economy to technology, sports, and world affairs.

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