नई दिल्ली, 22 सितंबर 2026: SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम पर चर्चा में दो बातें अक्सर एक-दूसरे में मिला दी जाती हैं: जाति-आधारित अपराध से वास्तविक पीड़ित की सुरक्षा और किसी शिकायत की निष्पक्ष जाँच। कानून दोनों को गंभीरता से लेने की माँग करता है। किसी आरोपी को बरी कर दिया जाना, अपने-आप यह साबित नहीं करता कि शिकायत जानबूझकर झूठी थी। इसी तरह किसी शिकायत को ‘दुरुपयोग’ बताने मात्र से पुलिस की जाँच या पीड़ित के अधिकार समाप्त नहीं होते।
यह लेख सार्वजनिक कानूनी जानकारी है, किसी खास मामले में व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। मामले की धाराओं, तारीख और दस्तावेज़ों के साथ योग्य वकील से सलाह लें।
SC/ST अत्याचार निवारण कानून क्यों बना?
भारत के आधिकारिक कानून-पाठ के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जाति-आधारित अत्याचार रोकने, अपराधों के विशेष न्यायालयों में विचारण और पीड़ित को राहत व पुनर्वास देने के लिए बनाया गया। यह केवल अपशब्दों से जुड़ा कानून नहीं है। धारा 3 में, अपनी-अपनी शर्तों के साथ, अपमान और धमकी के अलावा भूमि, सामाजिक बहिष्कार, जबरन श्रम, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और अन्य कृत्य भी शामिल हैं। हर आरोप पर वही उपधारा और उसके तत्व देखे जाते हैं जो वास्तव में लगाई गई है।
कानून की ज़रूरत को कम करके नहीं आँका जा सकता। हिटेश वर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम की पृष्ठभूमि में SC/ST समुदायों के खिलाफ अपमान, हिंसा और संपत्ति से बेदखली की ऐतिहासिक समस्या का उल्लेख किया। वास्तविक पीड़ित का FIR, सुरक्षा, साक्ष्य और सुनवाई तक पहुँचना इस कानून का केंद्रीय उद्देश्य है।
‘झूठा मुकदमा’ और ‘आरोप सिद्ध न होना’ एक बात नहीं
जानबूझकर मनगढ़ंत शिकायत साबित होना एक विशिष्ट तथ्यात्मक या न्यायिक निष्कर्ष है। पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य न मिलना, आरोपपत्र न बनना, अदालत में संदेह का लाभ मिलना या बरी होना अलग-अलग स्थितियाँ हैं। गवाह पर दबाव, खराब जाँच, देरी या साक्ष्य के अभाव से भी अभियोजन विफल हो सकता है। इसलिए बिना संबंधित आदेश और रिकॉर्ड देखे किसी शिकायतकर्ता को झूठा कहना अनुचित है। उलटे, न्यायालय यदि शिकायत के कथन को सही मानने पर भी संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व न पाए, तो उस धारा की कार्यवाही समाप्त कर सकता है; यह भी अपने-आप दुर्भावना का फैसला नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने हिटेश वर्मा निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी समुदाय के लोगों के बारे में सामूहिक रूप से कानून के दुरुपयोग की धारणा नहीं बनाई जा सकती। व्यक्तिगत मामले के तथ्य और साक्ष्य ही निर्णायक हैं।
कब लागू होती हैं धारा 3(1)(r) और 3(1)(s)?
धारा 3(1)(r) में SC/ST सदस्य को अपमानित करने की नीयत से जानबूझकर अपमान या धमकी और ‘public view’ में घटना होने का तत्व है। धारा 3(1)(s) में जाति के नाम से गाली देना तथा उसका ‘public view’ में होना प्रासंगिक है। आरोपित व्यक्ति का SC/ST सदस्य न होना भी धारा 3(1) के पाठ का हिस्सा है। स्थान सार्वजनिक संपत्ति हो, यह आवश्यक नहीं; सवाल यह है कि जनता के सदस्य कथित कृत्य को देख या सुन सकते थे या नहीं। केवल निजी झगड़ा या किसी व्यक्ति की जाति की जानकारी हर बार इन धाराओं को स्वतः लागू नहीं कर देती। लेकिन किसी निजी या संपत्ति विवाद के साथ वास्तविक जाति-आधारित अपराध भी हो सकता है; विवाद का होना शिकायत को अपने-आप झूठा नहीं बनाता। इन बातों की व्याख्या हिटेश वर्मा और सोहनवीर (2025) के फैसलों में मिलती है।
यह ‘public view’ शर्त पूरे अधिनियम की हर उपधारा पर लागू नहीं होती। उदाहरण के लिए भूमि या अन्य प्रकार के अत्याचार के आरोप में अलग वैधानिक तत्व देखे जाएँगे। सोशल मीडिया पर चलने वाले ‘चार लोगों के सामने होना ही ज़रूरी है’ जैसे एक-पंक्ति नियम कानून का सही विकल्प नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्या कहते हैं?
2018 का सुभाष काशीनाथ महाजन फैसला और बाद का बदलाव
2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन निर्णय में अदालत ने प्रारंभिक जाँच और गिरफ्तारी से पहले अनुमोदन संबंधी निर्देश दिए थे। इन्हें आज का सामान्य नियम बताना गलत होगा। संसद ने बाद में धारा 18A जोड़ी और सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा में वे निर्देश वापस लिए गए। पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020) में अदालत ने संशोधन को कायम रखते हुए मौजूदा स्थिति स्पष्ट की।
2020: पृथ्वी राज चौहान और हिटेश वर्मा
धारा 18 और 18A के तहत SC/ST अधिनियम का प्रथमदृष्टया अपराध दिखने पर अग्रिम जमानत पर सामान्य वैधानिक रोक है। लेकिन पृथ्वी राज चौहान ने स्पष्ट किया कि शिकायत के कथन से अधिनियम का प्रथमदृष्टया अपराध ही न बनता हो तो रोक लागू नहीं होती। यह सीमित, तथ्य-आधारित न्यायिक परीक्षण है; हर आरोपी के लिए स्वतः अग्रिम जमानत नहीं। अदालत ने अपवादस्वरूप कार्यवाही रद्द करने की शक्ति भी स्वीकार की।
हिटेश वर्मा में संपत्ति विवाद और घर के अंदर हुए कथित अपमान के रिकॉर्ड पर धारा 3(1)(r) का आवश्यक तत्व नहीं मिला। अदालत ने उस धारा का आरोपपत्र रद्द किया, लेकिन अन्य अपराधों की कार्यवाही जारी रहने दी। यह फैसला संपत्ति-विवाद से जुड़ी हर SC/ST शिकायत को झूठा नहीं ठहराता।
2025 का महत्वपूर्ण उदाहरण
सोहनवीर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (दिसंबर 2025) में सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत के कथन पर धारा 3(1)(s) के लिए ‘public view’ तत्व न मिलने से उस धारा की कार्यवाही रद्द की, मगर बाकी आरोपों का मुकदमा चलने दिया। अदालत ने शिकायत की सत्यता पर पूर्ण परीक्षण करके किसी को ‘झूठा’ घोषित नहीं किया। इससे आरोप-दर-आरोप परीक्षण का महत्व समझ आता है।
क्या FIR से पहले जाँच या गिरफ्तारी अनिवार्य है?
धारा 18A के अनुसार इस अधिनियम के तहत FIR दर्ज करने के लिए अनिवार्य प्रारंभिक जाँच और आवश्यक गिरफ्तारी के लिए पूर्व स्वीकृति की सामान्य शर्त नहीं है। FIR सूचना दर्ज होने का चरण है, दोषसिद्धि नहीं। FIR होते ही हर आरोपी को तत्काल गिरफ्तार करना भी कानून का नियम नहीं। गिरफ्तारी की आवश्यकता, लागू प्रक्रिया, साक्ष्य और न्यायिक निगरानी अलग प्रश्न हैं।
एक जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में सूचना दर्ज करने, गिरफ्तारी, नोटिस और जमानत की प्रक्रिया दी गई है। पुराने फैसलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धाराएँ लिखी होने के कारण वर्तमान मामले में उनके BNSS समकक्ष और संक्रमणकालीन स्थिति वकील से जाँचनी चाहिए। पुलिस या अदालत के वैध नोटिस की अनदेखी न करें।
अग्रिम जमानत, नियमित जमानत और केस रद्द करना
अग्रिम जमानत गिरफ्तारी की आशंका के चरण की राहत है; नियमित जमानत गिरफ्तारी के बाद अलग प्रश्न है। आरोप तय होने से पहले डिस्चार्ज और उच्च न्यायालय द्वारा कार्यवाही रद्द करना फिर अलग उपचार हैं। SC/ST अधिनियम के प्रथमदृष्टया अपराध पर अग्रिम जमानत की रोक को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सितंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट निर्णय ने भी जमानत पर छोटे परीक्षण और पूर्ण ‘मिनी ट्रायल’ के बीच अंतर याद दिलाया। सही आवेदन मामले के दस्तावेज़ और कानून की वर्तमान स्थिति देखकर ही चुना जाना चाहिए। पुराने CrPC 438 और 482 के संदर्भ को आज की BNSS 482 (अग्रिम जमानत) तथा 528 (हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्ति) से बिना संदर्भ के न मिलाएँ।
अगर किसी को लगता है कि उसे गलत फँसाया गया है
- तुरंत आपराधिक मामलों के अनुभवी वकील से FIR, आरोपित धाराएँ और तारीख दिखाकर सलाह लें।
- संदेश, कॉल रिकॉर्ड, CCTV, स्थान और स्वतंत्र गवाहों की जानकारी वैध तरीके से सुरक्षित रखें; साक्ष्य न बदलें।
- FIR और उपलब्ध मामले के कागज़ उचित कानूनी प्रक्रिया से लें; पुलिस या अदालत के वैध निर्देशों का पालन करें।
- वकील से तथ्य के अनुसार जमानत, डिस्चार्ज या उच्च न्यायालय में सीमित चुनौती पर बात करें।
- शिकायत को जानबूझकर झूठा बताने या प्रतिकारात्मक कार्रवाई से पहले स्पष्ट कानूनी आधार और संबंधित निर्णय की जाँच कराएँ। शिकायतकर्ता या गवाह को धमकाना, दबाव डालना या जाँच से बचना गलत और जोखिमपूर्ण है।
वास्तविक पीड़ित को क्या सुरक्षा मिलती है?
अधिनियम की धारा 15A में पीड़ित और गवाह के अधिकार, सूचना तथा सुनवाई से जुड़े प्रावधान हैं। विशेष अदालतों, राहत और पुनर्वास की व्यवस्था अधिनियम और केंद्र के प्रकाशित नियमों में दी गई है। सहायता की आवश्यकता हो तो स्थानीय पुलिस, संबंधित जिला प्रशासन, विशेष लोक अभियोजक या विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क किया जा सकता है। यदि शिकायत दर्ज करने या सुरक्षा में समस्या हो, तो योग्य वकील से उपलब्ध औपचारिक उपाय पूछें। केंद्रीय गृह मंत्रालय की सलाह राज्यों को कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर देती है।
आँकड़े ‘दुरुपयोग’ के बारे में क्या बताते हैं?
सामाजिक न्याय मंत्रालय की जुलाई 2026 सूचना NCRB के 2024 तक के अपराध-आँकड़ों का उल्लेख करती है। लेकिन दर्ज मामले, आरोपपत्र, दोषसिद्धि, बरी होना और अदालत में लंबित मुकदमे अलग माप हैं। उपलब्ध प्रकाशित संख्याओं से जानबूझकर झूठी SC/ST शिकायतों का कोई भरोसेमंद राष्ट्रीय प्रतिशत स्वतः नहीं निकलता। इस लेख में ऐसा कोई प्रतिशत नहीं दिया जा रहा। किसी भी दर का दावा करने से पहले संबंधित NCRB तालिका की परिभाषा, वर्ष और मामले की श्रेणी देखनी होगी।
पाठकों के आम सवाल
क्या सिर्फ गाली देने से SC/ST Act लग जाता है?
हर गाली पर नहीं। जिस उपधारा का आरोप है, उसके जाति-संबंधी और अन्य आवश्यक तत्व जाँचे जाएँगे। धारा 3(1)(r) और (s) में ‘public view’ का तत्व है; दूसरी उपधाराओं की शर्तें भिन्न हैं।
क्या हर व्यक्तिगत या ज़मीन विवाद में यह कानून लागू नहीं होगा?
ऐसा भी नहीं। विवाद के साथ वास्तविक जाति-आधारित अत्याचार हो सकता है। केवल विवाद का होना या केवल पीड़ित की जाति, दोनों में से कोई एक बात अकेले निर्णायक नहीं है।
क्या FIR होते ही गिरफ्तारी तय है?
नहीं। FIR, जाँच, गिरफ्तारी और दोषसिद्धि अलग चरण हैं। फिर भी गिरफ्तारी असंभव है, यह आश्वासन भी नहीं दिया जा सकता।
क्या अग्रिम जमानत मिल सकती है?
प्रथमदृष्टया अधिनियम का अपराध दिखने पर सामान्य रोक है। यदि शिकायत को सही मानकर भी ऐसा अपराध न बनता हो, तो अदालत सीमित अपवाद देख सकती है। परिणाम तथ्य-विशेष पर निर्भर है।
क्या बरी होने का अर्थ शिकायत झूठी थी?
नहीं। बरी होने और शिकायत के जानबूझकर गढ़े जाने के अलग कानूनी अर्थ हैं। फैसले के कारण पढ़े बिना निष्कर्ष न निकालें।
झूठी शिकायत सिद्ध हो तो क्या करें?
वकील से संबंधित न्यायिक निष्कर्ष और लागू सामान्य कानून के तहत उपलब्ध उपाय पूछें। केवल अपने अनुमान पर शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई या सार्वजनिक आरोप न लगाएँ।
वास्तविक पीड़ित मदद कहाँ माँगे?
पुलिस, जिला प्रशासन, विशेष लोक अभियोजक और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण संभावित संस्थागत रास्ते हैं। सुरक्षा और राहत के लिए अधिनियम व नियमों के प्रावधानों का हवाला दें।
निष्कर्ष
कानून का सही प्रयोग वास्तविक जाति-आधारित अत्याचार पर प्रभावी कार्रवाई और हर आरोप की निष्पक्ष, समयबद्ध जाँच—दोनों पर निर्भर करता है। किसी समुदाय के बारे में सामान्यीकृत आरोप, बरी होने को झूठ का प्रमाण बताना, या 2018 के वापस लिए गए निर्देशों को वर्तमान कानून कहना—तीनों पाठकों को भ्रमित करेंगे। मामले के दस्तावेज़ और नवीनतम न्यायिक स्थिति ही अगला कानूनी कदम तय करते हैं।
AI-generated editorial illustration | The Press of Asia
