नई दिल्ली — सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मणिपुर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए राहत शिविरों में हुई 25 “असामान्य मौतों” पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की और मुआवज़े की रकम में भारी असमानता पर भी सवाल खड़े किए।
मुख्य बिंदु
- मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मणिपुर के राहत शिविरों में हुई 25 अस्वाभाविक मौतों पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट सहित पूरी जानकारी मांगी।
- कोर्ट ने पाया कि इनमें से सिर्फ 20 मामलों में ही पोस्टमॉर्टम हुआ है और सवाल किया कि बाकी मामलों में ऐसा क्यों नहीं हुआ।
- अदालत ने ₹20,000-₹30,000 के मुआवज़े और अलग से चर्चा में आई ₹5-10 लाख की राशि के बीच के अंतर पर भी नाराज़गी जताई।
- रिपोर्टों में मृतकों की संख्या को लेकर भी असमानता सामने आई — आठ ज़िलों में 640 मौतों का आंकड़ा एक जगह दिया गया, तो दूसरी जगह यह संख्या 608 बताई गई।
- कोर्ट ने राज्य सरकार को सभी अस्वाभाविक मौतों में एफआईआर दर्ज करने और विस्थापितों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए।
ताज़ा घटनाक्रम
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने राज्य सरकार के रवैये पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “अपने मुख्य सचिव से कहिए कि वे आदेशों का इंतज़ार न करें। हमें बताइए कि आपने क्या कदम उठाए हैं।” यह टिप्पणी 2023 की जातीय हिंसा से जुड़ी जांच, सुरक्षा, राहत और पुनर्वास से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई।
क्या हुआ
सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर सरकार को निर्देश दिया कि वह राहत शिविरों में हुई 25 असामान्य मौतों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, मौत के कारण और अब तक की जांच की पूरी जानकारी के साथ विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी अस्वाभाविक मौतों के मामलों में प्राथमिकी (FIR) दर्ज होनी ही चाहिए और दर्ज मामलों में जांच में तेज़ी लाई जाए। इसके अलावा, विस्थापित परिवारों के लिए राहत शिविरों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं और रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ें सुनिश्चित करने को भी कहा गया। मुआवज़े को लेकर पेश किए गए आंकड़ों में भारी अंतर — कहीं ₹20,000-₹30,000, तो कहीं ₹5-10 लाख की चर्चा — ने अदालत को जवाबदेही में खामियों की ओर इशारा करने पर मजबूर किया।
पृष्ठभूमि
मई 2023 में मणिपुर में मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग को लेकर शुरू हुआ जातीय तनाव बड़े पैमाने पर हिंसा और विस्थापन में बदल गया था। हज़ारों परिवार तब से राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। इसी हिंसा से जुड़ी जांच, सुरक्षा, राहत और पुनर्वास से जुड़ी कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिन पर कोर्ट समय-समय पर राज्य और केंद्र सरकार से जवाब तलब करता रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है
यह मामला सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि हज़ारों विस्थापित परिवारों की सुरक्षा और जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल है। मौतों की संख्या में विसंगति और अधूरे पोस्टमॉर्टम जांच पर कोर्ट की नाराज़गी यह दिखाती है कि ज़मीनी स्तर पर निगरानी और रिकॉर्ड-कीपिंग में गंभीर खामियां हैं। मुआवज़े में भारी अंतर से यह भी सवाल उठता है कि पीड़ित परिवारों के साथ एक समान और पारदर्शी व्यवहार हो रहा है या नहीं।
आगे क्या
अब सबकी नज़र इस पर रहेगी कि मणिपुर सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कितनी तेज़ी से रिपोर्ट पेश करती है और बाकी बचे मामलों में पोस्टमॉर्टम व एफआईआर की प्रक्रिया पूरी करती है। अगली सुनवाई में अदालत यह भी परखेगी कि राहत शिविरों में सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर दिए गए निर्देशों का वास्तव में कितना पालन हुआ। मुआवज़े की रकम में एकरूपता लाने को लेकर भी आगे स्पष्टता आने की उम्मीद है।
स्रोत
- Free Press Journal — “Supreme Court Seeks Report On 25 Unnatural Deaths In Manipur Relief Camps, Questions ₹20,000-₹30,000 Compensation”
- India Legal — “Supreme Court seeks report on 25 unnatural deaths in Manipur relief camps, asks state to ensure safety of displaced persons”
- Dynamite News — “Manipur Relief Camp Deaths: Supreme Court Seeks Report on 25 Suspicious Deaths, Questions Delays”
