नई दिल्ली, 28 सितंबर: तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर असली हक किसका है, ममता बनर्जी का या पार्टी से अलग हुए अरूप रॉय-ऋतब्रत बनर्जी गुट का, इसका फैसला अब तय समय में होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निर्देश दिया कि दोनों गुट चार हफ्ते में अपनी दलीलें और दस्तावेज चुनाव आयोग के सामने पूरे करें, और उसके बाद आयोग तीन महीने के भीतर पार्टी के नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न पर अंतिम फैसला दे। यानी करीब चार महीने में तय हो जाना चाहिए कि 1998 में ममता बनर्जी की बनाई पार्टी का नाम और निशान किसके पास जाएगा।
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट का आदेश: चार हफ्ते में दोनों गुटों की दलीलें पूरी हों, फिर चुनाव आयोग तीन महीने में फैसला करे।
- आयोग की मांग नहीं मानी: आजतक के अनुसार आयोग ने दलीलें पूरी होने के बाद कम से कम छह महीने मांगे थे; कोर्ट ने कहा कि तीन महीने काफी हैं।
- नाम-निशान फ्रीज: 17 सितंबर से ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चिह्न के इस्तेमाल पर दोनों गुटों के लिए रोक है।
- अंतरिम पहचान: ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चिह्न, जबकि अरूप रॉय गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चिह्न मिला है।
- पहली परीक्षा: 6 अक्टूबर के उपचुनाव में दोनों गुट इन्हीं नए नामों और निशानों पर उतरेंगे।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। द ट्रिब्यून के अनुसार याचिका ममता बनर्जी की ओर से दायर की गई है। 25 सितंबर की पिछली सुनवाई में ममता गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि आयोग ने ऐसे समय फैसला लिया जब चुनाव प्रक्रिया चल रही थी, जिससे कानूनी उपाय का मौका नहीं बचा। दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी गुट के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने सबूत पेश करने के लिए अक्टूबर से आगे का समय मांगा था।
उसी सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की थी, “हम जानते हैं कि शिवसेना मामले में देरी का क्या नतीजा हुआ।” कोर्ट ने तब साफ कर दिया था कि अधिसूचित उपचुनावों के लिए की गई अंतरिम व्यवस्था को इस चरण में नहीं छेड़ा जाएगा, और आयोग से फैसले की उचित समयसीमा बताने को कहा था। सोमवार को कोर्ट ने यह समयसीमा खुद तय कर दी। बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक पीठ ने दोनों गुटों से कहा कि वे चार हफ्ते में आयोग के सामने अपनी दलीलें पूरी करें, जिसके बाद आयोग तीन महीने के भीतर फैसला करेगा।
कैसे टूटी तृणमूल: पूरी कहानी
चुनावी हार (मई 2026): 4 मई को आए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में 15 साल से सत्ता में रही TMC को करारी हार मिली। 294 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा ने 208 सीटें जीतीं और TMC 80 सीटों पर सिमट गई। ममता बनर्जी खुद भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी से हार गईं, जो बाद में राज्य के मुख्यमंत्री बने।
नेतृत्व पर टकराव (मई-जून): हार के बाद पार्टी की अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई। नेता प्रतिपक्ष चुनने को लेकर विवाद हुआ और विधायक ऋतब्रत बनर्जी व संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व के फैसले पर सवाल उठाए। 1 जून को पार्टी ने दोनों को निलंबित कर दिया, लेकिन इसके बाद करीब 60 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन कर दिया और वे नेता प्रतिपक्ष बन गए।
सांसदों की बगावत (जून): जून में लोकसभा के 28 में से 20 TMC सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में अलग राह पकड़ ली, नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का ऐलान किया और NDA सरकार को समर्थन दिया। बागी सांसदों पर हमारी जून की रिपोर्ट यहां पढ़ें।
समानांतर संगठन (22 जून): बागी गुट ने कोलकाता के न्यू टाउन में विशेष अधिवेशन बुलाया। इसमें हावड़ा मध्य से विधायक और ममता सरकार में 15 साल सहकारिता मंत्री रहे अरूप रॉय को पार्टी का चेयरपर्सन चुना गया और 30 सदस्यों की नई राष्ट्रीय कार्यसमिति बनाई गई। रिपब्लिक वर्ल्ड के अनुसार इसी बैठक में अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव पद से निलंबित किया गया और ममता बनर्जी को चेयरपर्सन पद से हटाने का दावा किया गया।
आयोग का दखल (17-18 सितंबर): दोनों गुटों के असली TMC होने के दावे के बीच चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को पार्टी का नाम और चिह्न फ्रीज कर दिया और 18 सितंबर को उपचुनावों के लिए दोनों को अलग-अलग अंतरिम नाम और निशान दिए। टाइम्स नाउ नवभारत के अनुसार आयोग का कहना था कि ऐसा न करने पर एक ही पार्टी के नाम से दोनों गुटों के नामांकन रद्द होने का खतरा था। ममता गुट के सांसद कल्याण बनर्जी ने इस आदेश को “कानून के विपरीत” बताया था।
दोनों गुटों के दावे
विवाद की जड़ पार्टी संविधान की व्याख्या है। द फेडरल देश की रिपोर्ट के अनुसार:
- ममता गुट: फरवरी 2022 में चुनी गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का कार्यकाल पांच साल, यानी फरवरी 2027 तक है, इसलिए जून 2026 में हुआ नेतृत्व का चुनाव अवैध है।
- अरूप रॉय-ऋतब्रत गुट: कार्यकारिणी का कार्यकाल तीन साल का था जो फरवरी 2025 में खत्म हो गया, इसलिए 22 जून का अधिवेशन पार्टी संविधान के मुताबिक नया नेतृत्व चुनने का वैध रास्ता था।
बागी गुट 80 में से करीब 60 विधायकों के समर्थन का दावा करता है। वहीं ममता बनर्जी पार्टी की संस्थापक हैं और अभिषेक बनर्जी समेत पार्टी का पुराना शीर्ष नेतृत्व उनके साथ है।
चुनाव आयोग कैसे तय करेगा
ऐसे विवादों का फैसला चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत होता है। इसमें आयोग पार्टी संविधान, संगठन में समर्थन, विधायकों और सांसदों की संख्या और अंदरूनी चुनावों की प्रक्रिया जैसे सभी तथ्यों को देखकर फैसला करता है, और उसका फैसला सभी गुटों पर बाध्यकारी होता है। इसके लिए कोई तय गणितीय फॉर्मूला नहीं है। हाल के वर्षों में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के मामलों में आयोग ने विधायकों के बहुमत वाले गुटों, यानी एकनाथ शिंदे और अजित पवार के गुटों, को पार्टी का नाम और निशान दिया था।
ध्यान रहे कि दलबदल कानून का “दो-तिहाई” वाला नियम यहां लागू नहीं होता। वह विधायकों और सांसदों की सदस्यता से जुड़ा है, जबकि नाम और निशान का विवाद पैराग्राफ 15 के अलग मापदंडों पर तय होता है।
आगे क्या
- 6 अक्टूबर: बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होंगे और 9 अक्टूबर को वोटों की गिनती होगी। दोनों गुट अंतरिम नाम और निशान पर लड़ेंगे।
- अक्टूबर का आखिर: दोनों गुटों को आयोग के सामने अपनी दलीलें और दस्तावेज पूरे करने हैं।
- जनवरी 2027 का आखिर: दलीलें समय पर पूरी हुईं तो आयोग को तब तक नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चिह्न पर अंतिम फैसला देना होगा।
द ट्रिब्यून के अनुसार आने वाले महीनों में राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव भी होने हैं। ऐसे में दोनों गुटों के लिए यह फैसला जितना कानूनी है, उतना ही राजनीतिक भी: जिसे ‘जोड़ा घास फूल’ मिलेगा, उसे बंगाल के मतदाताओं के बीच पार्टी की पुरानी पहचान का बड़ा फायदा मिलेगा।
स्रोत / संदर्भ
- Business Standard: SC fixes time frame for EC to decide dispute over TMC’s name, symbol
- आजतक: TMC के नाम और सिंबल पर तीन महीने में करें अंतिम फैसला, चुनाव आयोग को SC के निर्देश
- The Tribune: ‘We know what delay did in Shiv Sena’: SC asks EC to fix timeline
- टाइम्स नाउ नवभारत: TMC के दोनों गुटों को मिला नया नाम-नया चिन्ह
- NewsGram: Election Commission provides new symbols to TMC factions
- द फेडरल देश: TMC पर असली हक किसका?
- Republic World: TMC split deepens, rebel faction forms parallel 30-member committee (22 June)
- Wikipedia: 2026 Trinamool Congress split और 2026 West Bengal Legislative Assembly election (पृष्ठभूमि और सीटों के आंकड़े)




