मुंबई: भारतीय शेयर बाजार ने 18 सितंबर को लगातार छठे सप्ताह की गिरावट दर्ज की। Reuters के बाजार आंकड़ों के अनुसार यह 2020 के बाद सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है। दिन के कारोबार में Nifty 50 0.33% बढ़कर 23,346.40 पर बंद हुआ, जबकि Sensex 0.03% फिसलकर 74,294.96 रहा।
साप्ताहिक तस्वीर अधिक चुनौतीपूर्ण रही। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहने, वैश्विक बॉन्ड यील्ड बढ़ने और अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों की चिंता ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता पर दबाव डाला। ये सभी कारक भारत जैसे तेल आयातक और उभरते बाजार के लिए अहम हैं।
छठे सप्ताह की गिरावट का अर्थ
लगातार साप्ताहिक गिरावट अपने आप में किसी मंदी की घोषणा नहीं होती। यह बताती है कि हाल के कारोबारी दिनों में बिकवाली और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति, खरीदारी से अधिक प्रभावी रही है। शुक्रवार को कुछ खरीदारी दिखी, मगर रिपोर्ट में विश्लेषकों ने इसे ओवरसोल्ड स्थिति के बाद bargain buying बताया—स्थायी रुख बदलने का स्पष्ट संकेत नहीं।
तेल, दरें और विदेशी पूंजी
भारत अपनी अधिकांश तेल जरूरत आयात से पूरी करता है। तेल महंगा रहने पर आयात बिल, मुद्रास्फीति और कंपनियों की लागत पर असर पड़ सकता है। साथ ही अमेरिका और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में ऊंची दरें डॉलर परिसंपत्तियों की अपील बढ़ा सकती हैं। इससे उभरते बाजारों में विदेशी निवेश के प्रवाह पर दबाव आ सकता है।
यह संबंध सीधा या तयशुदा नहीं है। भारतीय बाजार पर घरेलू निवेश, कंपनियों के नतीजे, रुपये की चाल और नीतिगत फैसले भी असर डालते हैं। इसलिए किसी एक दिन की चाल से दीर्घकालिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
निवेशकों को किन संकेतों पर नजर रखनी चाहिए
आने वाले सत्रों में Brent crude, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, रुपये की चाल और विदेशी पोर्टफोलियो प्रवाह प्रमुख संकेतक रहेंगे। घरेलू IPO मांग भी द्वितीयक बाजार से कुछ तरलता खींच सकती है। यह लेख निवेश सलाह नहीं है।
Disclosure: Featured image is an AI-generated editorial illustration.
