2 अक्टूबर: दिल्ली हाई कोर्ट ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित “बड़ी साजिश” के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अपीलें खारिज कर दी हैं। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने 30 सितंबर को कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी 2026 के आदेश से बंधी है और उसमें तय शर्तों को बदल नहीं सकती। दोनों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत मुकदमा चल रहा है।
मुख्य बातें
- फैसला: हाई कोर्ट ने निचली अदालत के 4 जुलाई के आदेश के खिलाफ दायर दोनों की अपीलें खारिज कर दीं।
- अदालत की टिप्पणी: लाइव लॉ और द क्विंट के अनुसार बेंच ने कहा, “यह अदालत न्यायिक अनुशासन से बंधी है।”
- सुप्रीम कोर्ट की शर्त: जनवरी के आदेश के मुताबिक दोनों संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या एक साल बीतने के बाद, जो भी पहले हो, दोबारा जमानत मांग सकते हैं।
- बराबरी की दलील: सह-आरोपी तसलीम अहमद और खालिद सैफी को मिली अंतरिम जमानत के आधार पर राहत की मांग नहीं मानी गई।
- इस साल तीसरी बार: स्क्रॉल के अनुसार 2026 में यह तीसरा मौका है जब दोनों को जमानत नहीं मिली: 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट, 4 जुलाई को निचली अदालत और अब हाई कोर्ट।
अदालत ने क्या कहा
दोनों ने निचली अदालत के 4 जुलाई के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। खंडपीठ ने माना कि सुप्रीम कोर्ट “गुलफिशा फातिमा” मामले में इन दोनों की जमानत पर पहले ही फैसला दे चुका है और यह भी तय कर चुका है कि वे दोबारा अर्जी कब दे सकते हैं। द क्विंट के अनुसार अदालत ने कहा कि वह शरजील और उमर पर लगाई गई शर्तों में बदलाव नहीं कर सकती।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक हाई कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की स्थिति को बाकी सह-आरोपियों से अलग माना था। हमने सुनवाई से पहले की रिपोर्ट में इस मामले की पूरी पृष्ठभूमि बताई थी।
सुप्रीम कोर्ट का जनवरी का आदेश
5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं दी थी। स्क्रॉल के अनुसार अदालत ने कहा था कि ये दोनों बाकी आरोपियों की तुलना में “गुणात्मक रूप से अलग स्थिति” में हैं।
उसी आदेश में यह छूट दी गई थी कि संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने पर, या आदेश की तारीख से एक साल बाद, जो भी पहले हो, दोनों फिर से जमानत की अर्जी दे सकते हैं। इस हिसाब से एक साल की अवधि 5 जनवरी 2027 को पूरी होगी।
बचाव पक्ष और पुलिस की दलीलें
लाइव लॉ के अनुसार उमर खालिद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पाइस और शरजील इमाम की ओर से अधिवक्ता तालिब मुस्तफा और अहमद इब्राहिम पेश हुए। दिल्ली पुलिस का पक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने रखा।
बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के 18 मई के एक फैसले का सहारा लिया। स्क्रॉल के अनुसार UAPA के एक अलग मामले में दूसरी बेंच ने जनवरी के आदेश के कुछ पहलुओं पर सवाल उठाए थे और दोहराया था कि आतंकवाद-रोधी कानून के मामलों में भी “जमानत नियम है और जेल अपवाद।” लाइव लॉ के मुताबिक उस बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों के बीच दिख रहे मतभेद को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। यह मतभेद 2021 के “के.ए. नजीब” फैसले से जुड़ा है, जिसमें तीन जजों की पीठ ने ट्रायल में देरी को UAPA मामलों में जमानत का आधार माना था।
स्क्रॉल के अनुसार दिल्ली पुलिस की दलील थी कि किसी दूसरे मामले में समान संख्या वाली पीठ का फैसला आरोपियों के अपने मामले में दिए गए निष्कर्षों को नहीं बदल सकता।
बराबरी की दलील क्यों नहीं मानी गई
बचाव पक्ष ने सह-आरोपी तसलीम अहमद और खालिद सैफी का हवाला दिया, जिन्हें ट्रायल में देरी के आधार पर अंतरिम जमानत मिली है। लाइव लॉ के अनुसार हाई कोर्ट ने कहा कि उन दोनों की भूमिका अलग है, इसलिए उनके आधार पर खालिद और इमाम को वही राहत नहीं दी जा सकती।
अब आगे क्या
सुप्रीम कोर्ट की शर्त के मुताबिक दोनों संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होते ही, या 5 जनवरी 2027 के बाद, नई जमानत अर्जी दे सकते हैं। हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का कानूनी रास्ता भी खुला है। ऐसी किसी अपील की जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
बड़ी पीठ “के.ए. नजीब” से जुड़े सवाल पर जो फैसला देगी, उसका असर UAPA के दूसरे मामलों की जमानत याचिकाओं पर भी पड़ सकता है।
मामला क्या है
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एफआईआर 59/2020 में आरोप लगाया कि यह हिंसा एक सोची-समझी साजिश का नतीजा थी। मामले में UAPA के साथ भारतीय दंड संहिता, आर्म्स एक्ट और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं।
उमर खालिद सितंबर 2020 से हिरासत में हैं। शरजील इमाम जनवरी 2020 से जेल में हैं, जब उन्हें पहले एक अन्य मामले में गिरफ्तार किया गया था। स्क्रॉल के अनुसार मुकदमा अभी शुरुआती चरण में है। दोनों आरोपों से इनकार करते रहे हैं और आरोप अभी अदालत में साबित नहीं हुए हैं।





