नई दिल्ली/लंदन: सऊदी अरब से कच्चे तेल की खेप में आंशिक सुधार और अमेरिका–ईरान कूटनीति की उम्मीद से सोमवार, 21 सितंबर को तेल कीमतें 11 दिन के निचले स्तर तक फिसल गईं। लेकिन बाद में होर्मुज जलडमरूमध्य में एक टैंकर पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल लगने की खबर ने दिखाया कि आपूर्ति जोखिम खत्म नहीं हुआ है।
रॉयटर्स के अनुसार 08:59 GMT पर नवंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 2.12 डॉलर या 2 प्रतिशत गिरकर 101.75 डॉलर प्रति बैरल था। अक्टूबर WTI अनुबंध 1.96 डॉलर या 2 प्रतिशत नीचे 98.34 डॉलर पर था, जबकि नवंबर WTI 94.16 डॉलर पर रहा। ये समय-विशिष्ट बाजार भाव हैं और दिन के कारोबार में बदल सकते हैं।
बाद में एसोसिएटेड प्रेस ने ब्रिटेन के UK Maritime Trade Operations Centre के हवाले से बताया कि होर्मुज में प्रवेश कर रहे एक टैंकर पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल लगा। दो चालक दल सदस्यों को मामूली चोट आई और जहाज अपने बल पर बंदरगाह की ओर बढ़ता रहा। रिपोर्ट में हमलावर की पहचान की पुष्टि नहीं की गई थी।
तेल कीमतें क्यों गिरीं
बाजार ने सऊदी निर्यात प्रवाह में सुधार के संकेतों को महत्व दिया। Kpler के अस्थायी आंकड़ों के अनुसार सितंबर में सऊदी निर्यात 40 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर लौट आया, जबकि अगस्त में यह लगभग 24 लाख बैरल प्रतिदिन तक गिरा था। अंतिम आंकड़े संशोधित हो सकते हैं।
सऊदी ईस्ट–वेस्ट पाइपलाइन में रुकावट के बाद अधिक खेप को फारस की खाड़ी के टर्मिनलों और होर्मुज के रास्ते भेजा गया। यह बदलाव निर्यात को सहारा दे सकता है, लेकिन उसी मार्ग पर सुरक्षा खतरा बढ़ने से विकल्प की अपनी सीमा है।
निवेशकों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की संभावना को भी देखा। किसी संभावित मुलाकात की राजनीतिक इच्छा और वास्तविक समझौता अलग बातें हैं; इसलिए कीमत में आई गिरावट को स्थायी युद्धविराम का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
होर्मुज घटना ने जोखिम क्यों बढ़ाया
दुनिया के प्रमुख तेल समुद्री मार्गों में होर्मुज का विशेष महत्व है। जहाज पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल की ताजा घटना ने बीमा, चालक दल की सुरक्षा और जहाज संचालन से जुड़े जोखिम फिर सामने रखे। मामूली चोट और जहाज का चलते रहना राहत की बात है, लेकिन घटना की जांच आवश्यक है।
हमले की जिम्मेदारी या हथियार के स्रोत पर आधिकारिक पुष्टि से पहले किसी देश या समूह को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। बाजार की प्रतिक्रिया केवल भौतिक आपूर्ति से नहीं, बल्कि संभावित व्यवधान के डर से भी बनती है।
द प्रेस ऑफ एशिया ने 10 सितंबर की रिपोर्ट में बताया था कि तेल 100 डॉलर से ऊपर जाने पर एशियाई बाजारों पर दबाव बढ़ा था। आज की गिरावट उसी अस्थिरता का अगला चरण है, जिसमें बेहतर प्रवाह और सुरक्षा खतरा एक साथ कीमत तय कर रहे हैं।
भारत और एशिया पर असर
विश्लेषण: भारत जैसे बड़े आयातक के लिए तेल कीमतों में गिरावट आयात बिल और मुद्रास्फीति की आशंका को कुछ राहत दे सकती है। लेकिन ब्रेंट अभी भी ऊंचे स्तर पर है और रुपये की चाल, माल ढुलाई, बीमा तथा रिफाइनिंग मार्जिन घरेलू असर को बदल सकते हैं।
डीजल और विमान ईंधन की लागत परिवहन, कृषि, निर्माण और हवाई यात्रा तक पहुंचती है। इसलिए केवल दैनिक कच्चे तेल भाव देखकर उपभोक्ता कीमतों में तुरंत समान गिरावट की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। सरकारी कर, विपणन कंपनियों की नीति और पहले खरीदा गया महंगा स्टॉक भी असर डालते हैं।
एशियाई बाजारों के लिए ऊर्जा लागत के साथ समुद्री व्यापार की विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण है। ताजा व्यावसायिक और ऊर्जा कवरेज के लिए द प्रेस ऑफ एशिया का बिजनेस अनुभाग देखा जा सकता है।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए
अगले संकेतों में सऊदी निर्यात की वास्तविक लोडिंग, ईस्ट–वेस्ट पाइपलाइन की मरम्मत, होर्मुज से जहाजों की आवाजाही और अमेरिका–ईरान वार्ता की आधिकारिक पुष्टि शामिल हैं। वायदा अनुबंध की समाप्ति भी WTI के अलग-अलग महीनों के भाव में बड़ा अंतर पैदा कर सकती है।
इस खबर का सार दो तरफा है: बेहतर सऊदी प्रवाह और कूटनीति की उम्मीद ने तेल को नीचे खींचा, जबकि टैंकर पर हमला बताता है कि सुरक्षा प्रीमियम किसी भी समय फिर बढ़ सकता है।
स्रोत: Reuters की 08:59 GMT बाजार रिपोर्ट; Associated Press की होर्मुज टैंकर घटना रिपोर्ट; ICIS का तेल प्रवाह विश्लेषण.
AI-generated editorial illustration | The Press of Asia
