The Press of Asia Asia Desk
बिश्केक/नई दिल्ली | 30 अगस्त 2026
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक 31 अगस्त से 1 सितंबर तक Shanghai Cooperation Organisation यानी SCO के 26वें शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping, रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin, ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif सहित कई नेता इस बैठक में शामिल होने वाले हैं।
\nयह सम्मेलन केवल वार्षिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं है। Ukraine युद्ध, अमेरिका–ईरान संघर्ष, चीन और भारत पर अमेरिकी शुल्क दबाव, क्षेत्रीय सुरक्षा तथा मध्य एशिया में संपर्क परियोजनाओं के बीच सदस्य देशों की प्राथमिकताएं कई जगह मिलती भी हैं और टकराती भी हैं।
\nभारत के लिए सम्मेलन क्यों महत्वपूर्ण है
\nभारत SCO का पूर्ण सदस्य है और संगठन को मध्य एशिया के साथ सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और संपर्क बढ़ाने के मंच के रूप में देखता है। बिश्केक यात्रा प्रधानमंत्री मोदी के Uzbekistan दौरे के तुरंत बाद होगी। इस पूरे क्षेत्रीय कार्यक्रम का विस्तृत संदर्भ The Press of Asia की Modi Central Asia visit रिपोर्ट में उपलब्ध है।
\nनई दिल्ली के लिए आतंकवाद, कट्टरपंथ, सीमा-पार अपराध और Afghanistan की स्थिरता लगातार प्रमुख विषय रहे हैं। साथ ही भारत चाहता है कि संपर्क परियोजनाएं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें। यह भाषा China–Pakistan Economic Corridor पर भारत की आपत्तियों से भी जुड़ती है।
\nदूसरी चुनौती व्यापार है। SCO के बड़े बाजार होने के बावजूद भारत का कई सदस्य देशों के साथ व्यापार असंतुलित है और भौगोलिक संपर्क सीमित है। पाकिस्तान के रास्ते बाधाएं तथा Iran पर प्रतिबंधों का माहौल मध्य एशिया तक विश्वसनीय परिवहन मार्ग बनाने को कठिन बनाता है।
\nकिन नेताओं की मौजूदगी सबसे अधिक ध्यान खींचेगी
\nXi Jinping और Vladimir Putin SCO को ऐसी बहुध्रुवीय व्यवस्था के मंच के रूप में पेश करते रहे हैं जिसमें पश्चिमी संस्थानों का प्रभाव कम हो। दोनों नेताओं की संभावित द्विपक्षीय बैठक Ukraine युद्ध, ऊर्जा व्यापार, तकनीक और प्रतिबंधों के दबाव पर संकेत दे सकती है।
\nIran के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian की भागीदारी इस बार विशेष महत्व रखती है क्योंकि सम्मेलन अमेरिका–ईरान युद्ध शुरू होने के लगभग छह महीने बाद हो रहा है। रूस और ईरान ने सैन्य तथा आर्थिक संबंध गहरे किए हैं, जबकि Washington ने Tehran के व्यापारिक साझेदारों पर अतिरिक्त प्रतिबंधों की चेतावनी दी है।
\nभारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की एक ही बैठक में उपस्थिति भी ध्यान में रहेगी, लेकिन किसी औपचारिक द्विपक्षीय मुलाकात की पुष्टि अलग आधिकारिक घोषणा से ही मानी जानी चाहिए। एक साझा मंच पर मौजूदगी को अपने-आप राजनीतिक वार्ता मान लेना उचित नहीं होगा।
\nSCO क्या तय कर सकता है
\nSCO सचिवालय के अनुसार सदस्य देशों के राष्ट्रीय समन्वयकों ने अगस्त के अंतिम सप्ताह में बिश्केक बैठक के परिणाम दस्तावेजों को अंतिम रूप देने पर काम किया। परिषद की औपचारिक बैठक 1 सितंबर को होनी है और शिखर सम्मेलन संगठन की 25वीं वर्षगांठ भी चिह्नित करेगा।
\nआम तौर पर ऐसे सम्मेलन में संयुक्त घोषणा, सुरक्षा सहयोग, आर्थिक योजनाएं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विभिन्न संस्थागत निर्णय सामने आते हैं। लेकिन हर घोषणा लागू हो, यह जरूरी नहीं। SCO सर्वसम्मति पर चलता है और उसके सदस्य कई मुद्दों पर अलग रणनीतिक हित रखते हैं।
\nसंगठन के दस पूर्ण सदस्यों में China, Russia, India, Pakistan, Iran, Belarus और चार मध्य एशियाई देश शामिल हैं। इसके अतिरिक्त dialogue partners और observers का बड़ा समूह है। यह विस्तार मंच की पहुंच बढ़ाता है, पर निर्णयों को अधिक जटिल भी बनाता है।
\nसुरक्षा एजेंडा और एशिया की बदलती तस्वीर
\nकेंद्रीय एशिया लंबे समय से आतंकवाद, उग्रवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी और Afghanistan से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंतित रहा है। SCO की Regional Anti-Terrorist Structure इन्हीं विषयों पर सहयोग का एक प्रमुख तंत्र है। बिश्केक में साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण अवसंरचना की रक्षा भी चर्चा में रह सकती है।
\nपूर्वी एशिया में तनाव का अलग आयाम है। अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान सितंबर में Freedom Edge अभ्यास करेंगे, जिसकी पृष्ठभूमि हमारी Freedom Edge 2026 रिपोर्ट बताती है। SCO सीधे उस अभ्यास का जवाब नहीं है, लेकिन दोनों घटनाएं एशिया में समानांतर सुरक्षा समूहों के मजबूत होने की तस्वीर दिखाती हैं।
\nहालांकि SCO के संस्थापक दस्तावेज इसे किसी अन्य देश या संगठन के खिलाफ गठबंधन नहीं बताते। इसलिए इसे NATO जैसा सैन्य गठबंधन कहना भ्रामक होगा। इसके सदस्य संयुक्त अभ्यास और सुरक्षा वार्ता करते हैं, पर उनकी सैन्य प्रतिबद्धताएं एक समान नहीं हैं।
\nव्यापार, शुल्क और ऊर्जा
\nइस वर्ष अमेरिकी शुल्कों और प्रतिबंधों ने आर्थिक एजेंडा अधिक तीखा कर दिया है। China और India दोनों अमेरिकी व्यापार दबाव का सामना कर रहे हैं, जबकि Russia और Iran व्यापक प्रतिबंधों के बीच वैकल्पिक भुगतान, परिवहन तथा ऊर्जा बाजारों की तलाश में हैं।
\nमध्य एशियाई देशों के लिए अवसर और जोखिम साथ-साथ हैं। वे China की पूंजी, Russia के बाजार, India की मांग और पश्चिमी निवेश के बीच संतुलन चाहते हैं। अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए रेल, सड़क, डिजिटल नेटवर्क और ऊर्जा परियोजनाएं आगे बढ़ाना उनकी प्राथमिकता है।
\nसम्मेलन में घोषित किसी बड़े निवेश को तभी ठोस माना जाना चाहिए जब वित्तपोषण, समयसीमा और कार्यान्वयन संस्था स्पष्ट हो। केवल समझौता ज्ञापन या राजनीतिक घोषणा परियोजना की गारंटी नहीं होती।
\nनेपाल आपदा का संभावित मानवीय संदर्भ
\nसम्मेलन से ठीक पहले Nepal–Tibet सीमा पर विनाशकारी बाढ़ ने क्षेत्रीय आपदा तैयारी को केंद्र में ला दिया है। 750 मौतें और 3,000 से अधिक लोगों के लापता होने की नवीनतम स्थिति हमारी Nepal flood update में है।
\nभारत, चीन और अन्य SCO देशों की राहत क्षमता को देखते हुए हिमालयी जोखिम, early-warning data और सीमा-पार आपदा सहयोग पर राजनीतिक संदेश संभव है। हालांकि इसे औपचारिक परिणाम तभी माना जाएगा जब अंतिम घोषणा या किसी सरकारी बयान में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
\nक्या देखना चाहिए
\nसबसे पहले Modi की द्विपक्षीय बैठकों की आधिकारिक सूची और उनके बाद जारी बयान महत्वपूर्ण होंगे। दूसरा, Xi–Putin तथा Putin–Pezeshkian वार्ताओं में Ukraine, Iran और प्रतिबंधों पर भाषा देखी जाएगी। तीसरा, अंतिम घोषणा में आतंकवाद, व्यापार और संपर्क पर सहमति की वास्तविक सीमा सामने आएगी।
\nभारतीय पाठकों के लिए शीर्ष प्रश्न यह है कि क्या बैठक से मध्य एशिया तक पहुंच, ऊर्जा सुरक्षा और आतंकवाद पर उपयोगी सहयोग बढ़ेगा। The Press of Asia का Asia Desk सम्मेलन शुरू होने के बाद पुष्टि किए गए निर्णयों को इसी रिपोर्ट से जोड़ेगा।
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