नई दिल्ली, 28 सितंबर: देश आज शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की 119वीं जयंती मना रहा है। पंजाब सरकार के 2026 के अवकाश कैलेंडर में 28 सितंबर को भगत सिंह जयंती की छुट्टी है, और राज्य के स्कूल व शैक्षणिक संस्थान बंद हैं। सिर्फ 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले भगत सिंह आज भी युवाओं के लिए साहस के साथ-साथ सोच और तर्क की मिसाल हैं।
मुख्य बातें
- जन्म: 1907 में लायलपुर जिले के बंगा गांव में (अब पाकिस्तान में)। जयंती 28 सितंबर को मनाई जाती है, हालांकि कुछ स्रोत जन्मतिथि 27 सितंबर बताते हैं।
- पैतृक गांव: खटकड़ कलां, पंजाब।
- असेंबली बम कांड: 8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में कम तीव्रता वाले बम फेंके और खुद गिरफ्तारी दी।
- फांसी: 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में सुखदेव और राजगुरु के साथ; तब उनकी उम्र 23 साल थी।
- विचार: “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा और जेल में लिखा निबंध “मैं नास्तिक क्यों हूं”।
बचपन और क्रांति की ओर पहला कदम
भगत सिंह का जन्म सरदार किशन सिंह और विद्यावती के घर हुआ। परिवार पहले से आज़ादी की लड़ाई से जुड़ा था; उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह का उन पर गहरा असर पड़ा। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड ने किशोर भगत सिंह को झकझोर दिया। उन्होंने लाहौर के डीएवी स्कूल और लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित नेशनल कॉलेज में पढ़ाई की, जहां उनका परिचय क्रांतिकारी विचारों से हुआ।
आगे चलकर वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े और उसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) में बदलने में अहम भूमिका निभाई। नाम में “सोशलिस्ट” जोड़ना इस बात का संकेत था कि वे सिर्फ अंग्रेज़ों को हटाना नहीं, बल्कि बराबरी वाला समाज बनाना चाहते थे।
सॉन्डर्स कांड और असेंबली में बम
1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाठीचार्ज में घायल होने के बाद लाला लाजपत राय का निधन हो गया। इसका बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को गोली मारी गई। निशाना दरअसल पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट था, लेकिन पहचान में गलती हुई।
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में ऐसे बम फेंके, जिनका मकसद किसी की जान लेना नहीं था। उन्होंने पर्चे फेंके और भागने के बजाय गिरफ्तारी दी, ताकि अदालत को अपनी बात कहने का मंच बना सकें। पर्चों में लिखा था कि व्यक्तियों को मारना आसान है, लेकिन विचारों को नहीं मारा जा सकता।
जेल, भूख हड़ताल और फांसी
जेल में भगत सिंह ने राजनीतिक कैदियों के साथ बेहतर व्यवहार की मांग पर लंबी भूख हड़ताल की। इसी संघर्ष में उनके साथी जतिन दास की 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद सितंबर 1929 में मौत हो गई। भगत सिंह ने करीब 116 दिन बाद अक्टूबर 1929 में अपनी भूख हड़ताल खत्म की।
लाहौर षड्यंत्र केस में एक विशेष ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सज़ा सुनाई। 23 मार्च 1931 को तय समय से करीब 11 घंटे पहले लाहौर जेल में तीनों को फांसी दे दी गई और उनके पार्थिव शरीरों का चुपचाप हुसैनीवाला में अंतिम संस्कार कर दिया गया। तब भगत सिंह सिर्फ 23 साल के थे।
विचार जो आज भी प्रासंगिक हैं
भगत सिंह को अक्सर सिर्फ एक बहादुर क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है, लेकिन वे गहरे पाठक और विचारक भी थे। जेल में 1930 में लिखा उनका निबंध “मैं नास्तिक क्यों हूं” (Why I Am an Atheist) तर्क और विवेक पर आधारित सोच का उदाहरण माना जाता है। वे समाजवाद, बराबरी, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के पक्षधर थे, और “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा उनके साथ अमर हो गया।
आज के युवाओं के लिए उनकी सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि देशभक्ति का मतलब सिर्फ भावना नहीं, बल्कि पढ़ना, सवाल पूछना और अन्याय के खिलाफ सोच-समझकर खड़ा होना भी है। उन्होंने अदालत और अखबारों को अपने विचार रखने का ज़रिया बनाया, यानी हथियार से ज़्यादा भरोसा विचारों की ताकत पर किया।
आज के दिन क्या हो रहा है
- पंजाब में 28 सितंबर को राज्य अवकाश है; सरकारी और निजी स्कूल बंद हैं। CBSE, ICSE और IB स्कूलों के अभिभावक अपने स्कूल से पुष्टि कर लें।
- देश भर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम हो रहे हैं; पंजाब में उनके पैतृक गांव खटकड़ कलां में आम तौर पर इस दिन विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम होते हैं।
- संयोग से यही समय 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के 10 साल पूरे होने का भी है, जिसका ज़िक्र प्रधानमंत्री ने रविवार को मन की बात में किया।





